"मेरे चाँद "
आज म्हारे जियरा जगाई दिये है पीर,
साजन कैसे आऊँ मनवा अधीर ।
साँझ भये तो चमके बिजुरिया,
काँपे है छतिया धड़के है जियरा ।
रिमझिम बुंदिया टप-टप बरस रही,
चहुँ ओर सारी बगिया महक रही,
तुम बिन बालम मनवा अधीर ।
पपिया की पिऊ-पिऊ गुंजन गुँजा रही,
कोयल भी मीठी तान सुना रही,
तानो के बीच मन है पीर ।
आमों के बागों में झूले हैं सखियाँ,
गाती मल्हार रिझाने को रसिया,
ऐसे में बालम जिया है अधीर ।



10 Comments:
क्या अब यह सब बचा है?
बड़ी कठिन है डगर
ब्लॉग जगत पर स्वागत है-
इस ब्लॉग पर मेरा एक बाल-गीत-
http://saraspaayas.blogspot.com/2009/06/blog-post_25.html
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‘कौन पूछे है, लियाकत को यहाँ पर
पेट भरना है तुझे तो तोड़ पत्थर’
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July 1, 2009 at 7:48 AM
bahut sunder likha hai aapne.
July 1, 2009 at 9:17 AM
ye bhashaa padhna suha gaya...!
http://kavitasbyshama.blogspot.com
http://lalitlekh.blogspot.com
http://aajtakyahantak-thelightbyalonelypath.com
July 1, 2009 at 10:11 AM
बहुत सुन्दर कृति...
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चर्चा । Discuss INDIA
July 1, 2009 at 11:00 AM
आपकी रचना बहुत प्यारी है, बधाई।
July 1, 2009 at 7:04 PM
बेहतरीन!!
July 1, 2009 at 7:23 PM
gaaw ka manjar yaad aa gaya.............badhiya
July 1, 2009 at 10:38 PM
आमों के बागों में झूले हैं सखियाँ,
गाती मल्हार रिझाने को रसिया,
ऐसे में बालम जिया है अधीर
Lajawaab lok saanskriti ki khushboo bikhertaa sundar geet.........
July 1, 2009 at 10:54 PM
हिंदी भाषा को इन्टरनेट जगत मे लोकप्रिय करने के लिए आपका साधुवाद |
July 3, 2009 at 3:14 AM
wah!narayan narayan
July 7, 2009 at 6:36 PM
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