चिट्ठाजगत www.blogvani.com

Monday, July 6, 2009

"प्रेम-प्यार"

ढाई आखर प्रेम के, राखो तुम दिल में याद,
ना मिलें बाग-बगीचे, ना ही हाट बाजार,
झांको अपने ह्रदय में, फिर करो प्रेम संवाद,
अहं हटा कर बोझ सा, प्रेम से हो फरियाद,
प्रेम ही हो सपने में, जागन पर भी प्यार,
जित देखो तित पाओगे केवल प्यार ही प्यार,
नफरत फेंको बावड़ी, कर लो प्रेम प्रकाश,
चम-चम चमको जगत में, प्रेम दिया हो पास,
प्रेम ही बल हो बाजू में, हो प्रेम रस स्वाद,
राज करो तुम प्रेम से, गौरव प्रेम हो पास,
प्रेम करो इस जगत से, करके प्रेम उपवास,
शरद प्रेम हो राम से, प्रभुजी से ये आस ।

2 Comments:

Blogger ओम आर्य said...

बहुत ही निराला अन्दाज है आपका ................प्रेम ही प्रेम टपकती हुई दिखती है .............बधाई

July 6, 2009 at 5:03 AM

 
Blogger Udan Tashtari said...

बहुत सही दोहे!!

July 6, 2009 at 8:50 AM

 

Post a Comment

Subscribe to Post Comments [Atom]

<< Home